तुम कहो मै कैसे पीर हरूँ

अजय कुमार द्विवेदी

बढ़ रहे हृदय के पीड़ा की तुम कहो मै कैसे पीर हरूँ ।
सब कहते हैं धीरज रखना तुम कहो मै कैसे धीर धरूँ ।

बढ़ रहे हृदय के पीड़ा की तुम कहो मै कैसे पीर हरूँ ।

ब्याकुलता बढ़ती जाती है कुछ भी तो ठीक नहीं होता।
बस अँधियारा जीवन मे है तुम कहो मै कैसे दूर करूँ।

सब कहते हैं धीरज रखना तुम कहो मै कैसे धीर धरूँ ।

अँकुराना मुझको आता तो अँकोर मुझे कर लेते सब।
हो गया हूँ सबसे दूर बहुत तुम कहो मै कैसे पास रहूँ।

बढ़ रहे हृदय के पीड़ा की तुम कहो मै कैसे पीर हरूँ ।

अँधौटी बँधी है नेत्रों मे नयनों से कुछ ना दिखता।
मै अंकपाश फेंकू किसपर तुम कहो किसे बाँहों मे लूँ।

सब कहते हैं धीरज रखना तुम कहो मै कैसे धीर धरूँ ।

प्रियतमा मेरी है रूठ गई वो दूर तलक दिखतीं ही नहीं।
मन हो अधीर ये पूछ रहा कहो मै कैसे उसे तलाश करूँ।

बढ़ रहे हृदय के पीड़ा की तुम कहो मै कैसे पीर हरूँ ।

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