मुक्तक : शब्द

डॉ० धाराबल्लभ पांडेय ‘आलोक’,
मकेड़ी अल्मोड़ा, उत्तराखंड

भाव उमड़ते जो उर में तब,
शब्द प्रस्फुटन होता है।
पर व्यक्त न हो जो वाणी में,
अभिनव सृजन कराता है।।

सृष्टि रचयिता ब्रह्मा ने भी,
‘ओम’ शब्द से सृजन किया।
विस्फोट किया उन्माद भरा,
जड़ निश्चल को सचल किया।।

यही शब्द सार्थक वन वैभव,
ज्ञान मान का दाता है।
सरल-सरस सरिता सी बनकर,
सहज भाव दिखलाता है।।

केवल शब्दों की दुनिया में,
भाव अर्थ से हीन लगे।
उन्हें विभूषित भावान्वित कर,
हृदयग्राह्य अरू प्राप्य लगें।।

अर्थ बिना वह शब्द व्यर्थ है,
बिना भाव के प्राण हीन।
नीर बिना सूखी ज्यों सरिता,
सुंदर सुत ज्यों पितृ विहीन।।

शब्द ब्रह्म चैतन्य रूप हैं,
बुझी देह में फूंके प्राण।
सोई हुई विवस क्षमता में,
भर उमंग करता है त्राण।।

शब्दों के चैतन्य रूप का,
अनुभव निशिदिन किया
करो।
चिंतन की अविरल धारा का,
नित आवाहन किया करो।।

शब्द ब्रह्म की महिमा जानो,
नित हृदयंगम किया करो।
उसी ब्रह्म की चिर उपासना,
भावांजलि से किया करो।।

माता का प्रसाद समझकर,
शिरोधार्य करना है श्रेय।
जीवन में अभिलक्षित करना,
रहे सदा सब का यह ध्येय।।

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