जंगल को खा गये

सूर्यकरण सोनी

प्रकृति रुष्ट
जंगल को खा गये
तस्कर दुष्ट

हुए आबाद
पोखर व झरने
वर्षा के बाद

महुआ रस
थके मजदूर को
लगे सरस

कली का कल
छीन कर ले गया
भौरों का दल

सिंधु अपार
श्रम के बल पे ही
होता है पार

जिद्द की आरी
चलते ही कटती
रिश्तों की डारि

वाद-विवाद
मन में भर देता
कड़वा स्वाद

राज़ की बात
एक रोज़ खुलेगी
वक्त के साथ

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