हिमादास के लिए

ललित शौर्य, पिथौरागढ़

तुम दौड़ना दौड़ती रहना
अच्छा लगता है शायद
तुम्हें दौड़ना

कभी अखरता होगा
तुम्हारा दौड़ना कइयों को
वो रह-रहकर कोसते होंगे तुम्हें
फब्तियां कसी जाती होंगी तुम पर

लेकिन तुम उदास न हुई
तुम निराश न हुई
तुम दौड़ी, दौड़ते रहने के लिए
तुमने कम न होने दी रफ़्तार अपनी

तुमने सीख लिया था
आभावों को
साथ में रखकर दौड़ना
तुमने सीख लिया था
घृणा को पैरों तले कुचलकर दौड़ना
तुम दौड़ी थी
भेद-भाव को कोहनी में दबाकर

तुम इतना दौड़ी कि
अब हमें, हम सबको, पूरे देश को
अच्छा लग रहा है
तुम्हें दौड़ते हुए देखना

तुम अब दौड़ नहीँ रही हो
तुम उड़ रही हो
तुम उड़न परी हो, तुम उड़न तश्तरी हो
और भी ना जाने
क्या-क्या नाम दे दिए हैं
बाजार ने तुम्हें

ये वही बाजार है
जो कभी दे न सका था तुम्हें
एक जोड़ी कपड़े
एक जोड़ी जूते

बहन हिमा तुम हिम की तरह
जमी रहो मैदान में
डटी रहो
पिघलने न देना
अपने आपको
अपने अरमानों को

ताकि हम सब तुम्हें देखकर
गर्व कर सकें
प्रेरणा ले सकें
हो सके तो झांक सकें अपने भीतर
न जाने कितने हिमा -हिमादास को
बाहर खदेड़ दिया हमने
मैदान में आने से पहले ही

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