व्यंग्य : अबे! रावण अभी जिंदा है

ललित शौर्य

हर साल दशहरा आते ही रावण जलाने की राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। हर कोई रावण जलाकर फील गुड करना चाहता है। रावण के बड़े-बड़े पुतले बनाकर उन्हें मंत्री-संत्री टाइप के लोगों के हाथों से दहन करवाया जाता है। सदियों से ये परम्परा दौड़ी आ रही है। दशहरे में सभी पर ये फितूर छा जाता है। कागज के रावणों पर जमकर भड़ास निकाली जाती है।

पुतले के अंदर पटाखे डाल कर माहौल को दहलाने की नादान कोशिश की जाती है। इतना सब करने के बाद भी ना तो अब तक रावण का अट्टहास कम हुवा ना ही उसके कारनामों का सेंसेक्स गिरता देखा गया। बल्कि समाज में रावणपन हद से ज्यादा बढ़ते जा रहा है। हर जगह एक चेहरे के भीतर दस चेहरे छुपा कर लोग रावणियत फैलाये पड़े हैं। कई चेहरों , कई आँखों के साथ साजिशें की जारी हैं। रावण के मरने और सदियों से जलते रहने के बाद भी रावणपन वाली हनक का दहन अब तक ना हो सका। कोई भी राम और ना ही अग्नि रावण की सोच को खत्म कर सकी।आज के दौर में राम के आदर्श वनवास भुगत रहे हैं। रावण के कुकर्मों का राज योग चल रहा है।

चारों तरफ रावण के अनुयाइयों का बोलबाला है। उसकी लोकप्रियता चरम पर है। उसी का ग्लैमर चारों तरफ पसरा हुवा है। राम और राम के आदर्श कहीं नहीँ दिखाई पड़ते, ये किसी को नहीँ सुहाते। आदर्शों की बात सुनते ही लोग नाक-मुँह सिकोड़ने लगते हैं। आदर्शों के पचड़े में कोई नहीँ पड़ना चाहता। सभी अनीति और अमर्यादा के मुक्त गगन में उड़ना चाहते हैं। मुक्त गगन में उड़ने के लिए रावण की सोच की हवा का साथ होना जरूरी है।

रावण दहन अब केवल प्रतीकात्मक है। ये एक मनोरंजन बन चुका है। इस प्रतीकात्मक क्रियाकर्म से कोई सीख का ताप नहीँ लेना चाहता। दरसल दिक्कत ये है कि रावण जैसा या रावण के गुणों से लबरेज बन्दा ही रावण को जला रहा है। जिससे रावण फुल समर्थन वाली फीलिंग से जल रहा है। जब समर्थन और फीलिंग सेम हो तो जलने में भी मजा आता है। अब जब रावण को जलने में मजा आने लगा है तो समझ सकते हैं, रावणपन कितने मौज में है। वो हर जगह व्याप्त है। लूट-खसोट, बलात्कार, हिंसा, हत्या, और अपहरण का रावण पूरे देश में शासन चलाये हुए है। वो पूरे दम के साथ अट्टहास कर रहा है।

राम अब ढूढ़े नहीँ मिल रहे हैं। राम केवल कल्पना होते जा रहे हैं। वो मंदिरों में मूर्तियों या घरों में कैलेंडरों में लटके पड़े हैं। वो इनसे बाहर आने का साहस नहीँ कर पा रहे। राम की शक्ति क्षीण हो चुकी है। राम की शक्ति उनकी प्रजा है, उनके अनुयायी हैं। पर अब उनके अनुयायीयों की संख्या सिमट चुकी है। रावण के मानने वालों की संख्या में विस्फोटक बढ़ोत्तरी है। इसीलिए राम के आँखों से आँशु ढुलक रहे हैं। दम्भी रावण मुस्कुरा रहा है। वो राज-पाठ , समाज, घर-आँगन सभी जगह घुस चुका है।वो राम का देशनिकाला करने पर आतुर है।

इस तरह हर साल रावण के जलने के बाद, उसके पुतलों पर लाठियां भांचने के बाद, उसे सपरिवार राख करने के बाद भी वो हम सब में जिंदा है। ये सब देखकर अनायास ही मुँह से निकल पड़ता है,” अबे! रावण अभी जिंदा है”।

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