व्यंग्य : बापू के चौथे बंदर का हड़कम्प

इं. ललित शौर्य

बापू के चौथे बंदर ने भयंकर हड़कम्प मचाया हुवा है। चारों तरफ उसी की तूती बोल रही है। लोग उस पर फिदा हैं। बापू का ये बंदर लेटेस्ट है। ट्रेंड में है। ये बापू का पाला हुवा नही है बल्कि बापू के जाने के बाद इसका लालन-पालन हुवा है। लेकिन फिर भी इसने जबर्दस्ती बापू के तीनों बंदरों के बीच अपनी जगह बना ली है।

उसने तीनों बंदरों को धकिया और लतिया कर किनारे सरका दिया है। बापू के तीनों बंदर,अब अप्रसांगिक हो चले हैं। उनका प्रसंग ढूढे नहीँ मिलता है। अब तो सारे प्रसंग और छंद इसी बंदर पर बन रहे हैं , जो जबरदस्ती घुसा चला आया है। इसकी महिमा लिखने को लेखकों के मोबाइल में मैमोरी कम पड़ रही है। लैपटॉप की हार्डडिस्क फुल है।

इतना सब लिखा जा चुकने के बाद भी लिक्खाड़ टाइप के कवि , लेखक इस चौथे बंदर पर बहुत कुछ लिखना चाहते हैं। ये चौथा बंदर तकनीकि से लबरेज है। चैटिंग, सैटिंग में माहिर है। इंस्टा और ट्विटर पर एक्टिव है। ये फेसबुक का पाँच हजारी है। व्हाट्स पर दर्जनों ग्रुप्स का एडमिन है। ये सोसल मीडिया का चटक तीतर है। ये तीन आँखों का मालिक है। जल,थल, नभ तीनों जगह इसका दखल है।

ये बापू के पिछले तीन बंदरों से कोई इत्तेफाक नहीँ रखता। बल्कि उन बंदरों के समझाने पर उन्हें डपटते हुए बोलता है अपने संस्कार और अपने उपदेश अपनी पूँछ के नीचे दबा लो। क्या कर लिया तुमने इतना संस्कारी बनकर। मेरी तरह बिंदास जियो। वो बंदर नंबर वन से बोलता है, ये क्या तुम मुँह पर हाथ लगाये दुबके रहते हो। ये जमाना बोलने का है। तगड़ा बोलने का। विवादित बोलने का। जहर उगलने का है। जो जितना बड़बोला है, दुनिया उसकी उतनी ही कायल है। इसलिए अब ये तुम्हारा बुरा मत बोलो वाला सीन ओल्ड हो चुका है।

इसके बाद वो बंदर नम्बर दो को पूँछ मारते हुए बोलता है। अबे, आँखे खोल। सुबह हो गई मामू। दुनिया इतनी हसीन है और तू आँखें बंद करके बैठा है। देखने को बहुत कुछ है। सबकुछ देख। बुरा भी देख, आँखें फाड़कर देख। बुरा देखेगा नहीँ तो व्हाट्स एप्प और फेसबुक पर वायरल कैसे करेगा। इसलिए आँखें मूदना बंद कर , आखें खोलकर कूदना चालू कर दे।

बंदर नंबर तीन के कान ऐंठते हुए ये बंदर नम्बर चार बोलता है,” ये क्या कानों को हाथों से ढ़ककर बुत बना पड़ा हुवा है। ये ले, हैड फोन लगा और मस्त रैप सुन। बुरा ना सुन वाले आदर्श के चक्कर में तूने हनी सिंह और मीका सिंह को भी सुनना छोड़ दिया है। अरे मूर्ख सुनोगे नहीँ तो सुनाओगे कैसे।”

इस चौथे बंदर के अपने ही रुल हैं, ये बापू की लाठी को डंडा बनाकर रौब झाड़ता है। बापू के चश्मे को मोर्डन लुक में ढालकर टशन मारता है। ये अहिंसा को अंगीठी की राख की तरफ फूँक मारकर उड़ा डालता है। ये हिंसा के तवे में रोटियां सेंकने में माहिर है। इस चौथे बंदर का गदर देखकर सभी इसी को अपना आदर्श बना चले हैं। बाकी तीन बंदर गांधी जी की मूर्ति के पास जाकर उनके चरण पकड़कर सुबक रहे हैं। और ये हीरो गाँधी जी के कन्धे पर चढ़ा बैठा है।

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