तेरा मजहब क्या है चाँद

कृति- तेरा मजहब क्या है चाँद
कवि-मुकेश कुमार सिन्हा
प्रकाशन-अभिधा प्रकाशन
पृष्ठ-104 मूल्य-200/-

मंत्रिमण्डल सचिवालय(राजभाषा) विभाग ,पटना से पांडुलिपि प्रकाशन अनुदान प्राप्त यह कृति ” तेरा मज़हब क्या है चाँद”मुकेश कुमार सिन्हा जी की प्रथम कृति है।बकौल सुनील सौरभ -“साहित्य,संस्कृति और कला के क्षेत्र में प्राचीन काल से अब तक बिहार ने अनेक अनमोल रत्न पैदा किया है।किसी भी क्षेत्र में यहाँ प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है।साहित्य के क्षेत्र में तो राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर के लेखकों-साहित्यकारों की एक लंबी सूची है।यही कारण है कि बिहार में नई पीढ़ी का झुकाव साहित्य के क्षेत्र में होता रहा है।पिछले एक दशक में बिहार में प्रतिभाशाली युवा साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से लोगों को प्रभावित किया है।ऐसे ही युवा रचनाकारों में मुकेश कुमार सिन्हा भी शामिल हैं””तेरा मजहब क्या है चाँद” कविता संग्रह में कुल 70 कविताएँ है।शीर्षक कविता अंतिम कविता है।गया,बिहार से ताल्लुक रखने वाले मुकेश कुमार सिन्हा इस संकलन में अद्भुत शीर्षकों के अन्दर कविता समाहित की है,यथा-मैं भी फल्गु सा,मेरी माँ है ट्रेन,बचाए रखना दामन,मेरी क्या बिसात, रावण बनना है राम,ज़ख़्म की तलाश,प्लीज रोने दीजिए, नहीं समझ पाया भूगोल,रोटी तेरे रंग हजार, उतारो पश्चिमी चादर,बादल भी इन्सान हो गया,तेरा मज़हब क्या है चाँद आदि
मुक्त छंद में लिखी गयी इस संग्रह की सारी कविताएं कुछ न कुछ संदेश लिए हुए हैं।नवीन शीर्षक की नवीन कविताएँ पाठकों को मोहती हैं।इनकी अन्तर्वेदना पहली ही कविता “मैं भी फल्गु सा” में फूट पड़ी है,जो अन्तिम कविता तक व्याप्त है-
कैद हैं दिल में
बेशुमार आँसू
जो छलकने को हैं तैयार
किन्तु डर है
समाज से
क्योंकि
नमक लिए बैठा है
यहाँ इन्सान
ज़ख़्म की तलाश में!!!
वाकई रहीम कवि के स्वर में स्वर मिलाती यह कविता रहीम का स्मरण करा जाती है-
रहिमन निज मन की व्यथा,मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैंहें लोग सब,बाँटि न लीहें कोय ।।
“मेरी माँ है ट्रेन” शीर्षक कविता में कवि मुकेश कुमार सिन्हा ने बाल-बच्चों को पालती हुई माँ को कभी थकते नहीं देखा है।जैसे ट्रेन थकती नहीं, अनवरत चलती रहती है,वैसे ही माँ कभी थकती नहीं-
माँ भी थकती नहीं
और देखा नहीं
ट्रेन को भी
कभी थकते हुए।
आज स्वार्थ के महाजाल में फँसता इन्सान अपनी देवी सदृश बूढ़ी माँ को भी वृद्धाश्रम में छोड़ आता है।परन्तु वृद्धाश्रम में भी माँ जिउतिया व्रत करती है और अपनी संतानों के लिए दुआ माँगती है।”उदास माँ का जिउतिया”शीर्षक कविता में कवि की यह मार्मिक पंक्ति देखें-
वृद्धाश्रम की वो माँ
उपवास में थी
ताकि
वंशबृद्धि हो
और हो
औलाद का विकास !
वाकई आज भी हम दुर्गासप्तशती की पंक्ति को सही पाते हैं “कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति”।जिस पुत्र ने अपनी माँ को खुद से दूर वृद्धाश्रम में रख आया,उसके लिए भी माँ की ममता कम नहीं होती।यह माँ की महानता है।
पश्चिमी सभ्यता आज हिन्दुस्तान में भी पंख पसार चुकी हैं।आश्चर्य होता है कि कभी हस्तिनापुर का राजमहल और उद्यान और आज का म्यूजियम और पार्क नवयुवकों और नवयुवतियों का प्रणय स्थल हो गया है।हम आप उस पार्क में खुली आँखों से वासना का वह स्वछन्द दृश्य देख भी नहीं सकते ।वहाँ ठहर नहीं सकते।ऐसा वीभत्स दृश्य अब दिल्ली ही नहीं दिल्ली के बाहर भी दृश्टिगोचर होने लगा है।मुकेश कुमार सिन्हा जी ने “उतारो पश्चिमी चादर ” शीर्षक कविता में ऐसे लोगों की अच्छी ख़बर ली है-
सड़क,पार्क
घर नहीं तुम्हारा
जो उतारू हो जाते हो
वो “सब कुछ” करने को
जो होना चाहिए
बंद कमरे में!
आते जाते लोग
देखते हैं तुम्हें
और तुम
मूँद रखे हो अपनी आँखें
या फिर
ओढ़ रखे हो पश्चिमी चादर!
आज पहले जैसा समाज नहीं रहा।सामाजिक समरसता नहीं रही।यह समाज हर चुनाव में बँटता है,ज़ख़्मी होता है।पाँच साल में पुराना घाव भरता भी नहीं कि फिर चुनाव हाजिर।फिर धर्म के नाम पर,जाति के नाम पर वोट बटोरने के लिए समाज को तोड़ा जाता है।ज़ख़्मी किया जाता है।कवि मुकेश कुमार सिन्हा की दृष्टि चाँद तक जाती है।वही चाँद जिसे हिन्दू करुवाचौथ और चौरचन पर्व में पूजता है।और वही ईद का चाँद मुस्लिम समाज में भी खुशियाँ भर देता है।एक ही चाँद को विभिन्न धर्मावलंबी पूजते हैं,तो ये आपस में बँटे कैसे होते हैं ?हमें आपस में विलगाता कौन है ?बड़ी ही मासूमियत से मुकेश कुमार सिन्हा जी ” तेरा मज़हब क्या है चाँद” शीर्षक कविता के द्वारा चाँद से ही प्रश्न करते नज़र आते हैं-
खुशियाँ बाँटते हो
ईद में
कौमुदी में
अमृत की बरसात
और
करवाचौथ पर
तोड़वाते हो
सुहागन का व्रत !
बता न चाँद
धार्मिक नज़रों ने
बाँट रखीं
हर चीजें
फिर
तू क्यों न बँटा
आजतक !!

मुकेश कुमार सिन्हा जी की यह प्रथम कृति बड़ी अच्छी बन पड़ी है।उन्हें बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ।भविष्य में आपसे और भी असरदार कृतियाँ निकलेंगी।जय साहित्य

कैलाश झा किंकर

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