बेरोजगार का इंटरव्यू

देवेन्द्रराज सुथार, जालोर, राजस्थान

नौकरी और छोकरी वालों को इंटरव्यू देने के पश्चात अपेक्षित सफलताएं हासिल नहीं होने पर मैंने थक-हारकर मीडिया को अपना इंटरव्यू देना ही बेहतर समझा। इसके लिए सबसे सस्ते, सुप्रसिद्ध व काम चलाऊ न्यूज चैनल ‘परसों तक’ से संपर्क साधा। सारी बात बतायी और वह राजी हो गया। मुझे नामी-गिरामी न्यूज चैनल ने अपने स्पेशल शो में बुलाया। एक आलीशान सोफे पर बैठाया। चपरासी चाय-कॉफी लेकर आया। मैंने जैसे ही चाय का कप उठाया। तभी हसीन व कमसिन महिला एंकर ने मुझ पर सवाल दागा – क्या आप बेरोजगार है? मैं – हां, कोई शक! शत-प्रतिशत शुद्ध बेरोजगार हूं। जिस पर अब तब किसी नौकरी की छाया नहीं पड़ी है। एंकर – अच्छा… अच्छा… तो बताइये कि आपको बेरोजगारी में कैसा लगता है? मैं – जी! चाकू खरबूजे पर गिरे या खरबूजा चाकू पर। कटना तो खरबूजे को ही है। एंकर – ये क्या जवाब हुआ! मैं – ये क्या सवाल हुआ! एंकर – आप हमारा समय खराब कर रहे हैं। मैं – क्योंकि मेरा समय सरकार खराब कर रही है।

एंकर – आपकी प्रॉब्लम क्या है? मैं – नौकरी। है आपके पास सॉल्यूशन? एंकर – तो आपको नौकरी चाहिए? मैं – नहीं। केवल नौकरी ही नहीं बल्कि डिस्काउंट में छोकरी भी चाहिए। मैं तो आपके चैनल के माध्यम से सुझाव देना चाहूंगा कि सरकार को ‘वन नौकरी, वन छोकरी’ की योजना का शुभारंभ करना चाहिए। अगले चुनाव में जो पार्टी ये दावा फेंकेगी, युवा उसे ही वोट देंगे। एंकर – लेकिन सरकार का मानना है कि युवाओं को बेरोजगारी से राहत पाने के लिए पकौड़ा भी बेचना पड़े तो बेचना चाहिए। इस बारे में आप कुछ कहेंगे! मैं – सही कहा! कोई काम छोटा नहीं होता। लेकिन मुझे स्कूल या कॉलेज में पकौड़े बनाना नहीं सिखाया। यदि युवाओं से पकौड़े बेचाने हैं तो इसके लिए सरकार पकौड़ा पाठ्यक्रम को लागू करें। यकीन मानिये! फिर तो मैं पकौड़ा पाक कलाशास्त्र में पीएचडी करूंगा। एंकर – अच्छा.. तो बताइये कि आजकल आप क्या कर रहे हैं? मैं – जी! सुबह उठता हूं, टूथब्रश करता हूं और 1.5 जीबी डाटा पूरा करने में लग जाता हूं। ‘उठो, जागो और लक्ष्य तक पहुंचे बिना मत रुको’ की जगह आजकल ‘उठो, जागो और 1.5 जीबी डाटा खत्म न हो तो अब तक मत रुको’ फैशन में है। उस नरेंद्र से इस नरेंद्र के समयांतर का यह कटु सत्य है।

एंकर – आप तो अपनी बेरोजगारी को बहानों में टाल रहे हैं। क्या आपने कभी किसी नौकरी-भर्ती के लिए आवेदन किया है? मैं – जी! आधा भिखारी तो आवेदन करके हो गया हूं।। अब आप क्या चाहती है कि पूरा भिखारी हो जाऊं। एक आवेदन करने के 500 रुपये लगते हैं। अब तक 500 आवेदन कर चुका हूं। और हजारों दफा असफल हो चुका हूं। एंकर – तो आपने मेहनत नहीं की होगी? मैं – जी! मेरे लिए मजबूरी का नाम ही मेहनत है। और आप कह रही है कि मैंने मेहनत नहीं की होगी। यह कहिए कि आपने सेटिंग नहीं की होगी। या आपने चीटिंग नहीं की होगी। एंकर – तो आपके कहने का मतलब है कि आजकल नौकरी सेटिंग और चीटिंग से मिलती है? मैं – सिर्फ नौकरी ही नहीं बल्कि छोकरी भी इन्हीं दोनों से ही मिलती है। आजादी से पहले हर भारतीय के लिए स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार था, जो अब हर भारतीय के लिए सेटिंग और चीटिंग मेरा जन्मसिद्ध अधिकार में तब्दील हो गया है। एंकर – आप बड़ा कड़वा बोलते हैं। आप संत क्यों नहीं बन जाते? मैं – नहीं। मैं बेरोजगारी में खुश हूं। मुझे बाबागिरी और बाबूगिरी करके और अधिक बदनाम नहीं होना है। कृपया करके मुझे बख्श दो। एंकर – अंतिम सवाल अब आप आगे क्या करेंगे? मैं – आपके साथ चंद घंटे बिताने के बाद मैंने यह निश्चय किया है कि मैं अब आपकी तरह एंकर बनना पसंद करूंगा। मेरे पास पूछने के लिए तरह-तरह के सवाल है। इसलिए अब मैं भी सवाल करूंगा। एंकर – अच्छा तो आपने पत्रकारिता की है। मैं – जी! वो अभी आपके साथ बातें-बातें करते हो गई है।

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