लघुकथा : उल्टा दाँव

सूर्यकरण सोनी ‘सरोज’
बाँसवाड़ा (राजस्थान)

बहस का कोई अंत नहीं होता, कैंची की तरह चलकर वाक्यों को काटते-काटते कब रिश्तों को काट देती है पता ही नहीं चलता। समानता के मुद्दे पर छिड़ी बहस निजी रूप ले चुकी थी। जोशी जी और यादव जी अपने-अपने वाद रखे जा रहें थे।

– आपकी समाज ने, सदैव हीन समझ कर हमारा शोषण किया है जोशी जी !

– उस समय कर्म के आधार पर भेद रहा भी होगा ।परन्तु यादव जी ; आज का समय और पीढ़ी बदल चुकी है।

– कुछ नहीं बदला, कहाँ है आपके और हमारे बीच बेटी और रोटी व्यवहार ? तभी तो समानता आएगी । सवाल के साथ ही यादव जी का पलड़ा भारी हो चुका था ।

-जोशी बोले ,”आपका पुत्र अभी कितने वर्ष का है ?”

– सात- आठ वर्ष के लगभग है।

– तो फिर ठीक है , मेरी बिटिया पाँच साल की है ,युवा अवस्था में जब दोनों एक दूसरे के योग्य रहे तो बेटी व्यवहार कर देंगे । क्यों न आज से ही आपके साथ रोटी व्यवहार शुरू किया जाये । तो फिर चलिए …..

– कहाँ चलना है भाई !

– होटल ! आज का भोजन आपके साथ बैठकर करेंगे।

– यादव जी , का दाँव उल्टा पड़ गया था । बहस ,भोजन के साथ समानता की ओर बढ़ रही थी ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *