लघुकथा : लव मैरिज

सूर्यकरण सोनी ‘सरोज’
बाँसवाड़ा (राजस्थान)

जितना सोचा था परिस्थितियां उससे कहीं अधिक विकट थी । दीपक को रुपयों का लालच तो प्रीति को घर लौट चलने की करुण दुहाई दी जा रही थी।

परिजनों के विलाप ने केवल मुझे ही नहीं, दीपक और पुलिस थाने के कर्मचारियों को भी हिला कर रख दिया था । प्रीति के पिता दीपक से प्रीति को समझाने की और खुद समझने की मिन्नतें कर रहे थे , “बेटा तुम कह दो ,तो ये मेरे साथ आ जायेगी ।

हमारी इज्जत तुम्हारे हाथों में है । मेरी छोटी बेटी और बेटे का ब्याह शेष है ,समाज में प्रतिष्ठा धूमिल हो गई तो कौन जोड़ेगा रिश्ता ; ऐसे परिवार से जिसकी बड़ी बेटी भाग कर ब्याह कर ले। ” बर्फ सा जमा दीपक अपने ससुर के आँसुओ की गर्मी में पिघल कर सिर्फ इतना ही बोल पाया ।

– अंकल ,प्रीति जाना चाहे तो मैं रोड़ा न बनूँगा ,उसे किससे साथ रहना है ये फैसला वही करेगी ।

परिजन प्रीति से मनुहार करने लगे । चलो बेटी ! घर चले चलो ! अपने भाई-बहन की लिए ही चल दो !

पर प्रीति टस से मस न हुई । उसने अपने स्टेटमेंन्ट में दीपक के साथ रहने की स्वीकृति दे दी । बदहवास परिवार हताशा और शर्मिंदगी की चादर ओढ़े बाहर निकल गया ।

मैं समझ नहीं पा रहा था ये प्रीति का साहस है या उसकी बेशर्मी ! वचन का निबाह है या संस्कारों की तिलांजलि ! टीचर का वह वाक्य अनायास मेरे भीतर के अंतर्द्वंद पर विजय पा रहा था ।

“औरत जब किसी को चाहती है तो दिलोजान से चाहती है। जब किसी से नफरत करती है तो दिलोजान से नफरत करती है।

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