वीर तेजाजी महाराज महान गौ-रक्षक और समाज सुधारक

श्री तेजा दशमी मेला व जन्मोत्सव पर विशेष आलेख

सुबेदार रावत गर्ग उण्डू
( सहायक उपानिरीक्षक – रक्षा सेवाऐं व
स्वतंत्र लेखक, रचनाकार, साहित्य प्रेमी )

भारत देश की धन्य धरा पर कई ऋषि मुनियों, तपस्वियों यहां तक कि भगवान खुद इसी धरती मानवलोक पर अवतरित कर अपने आप को धन्य पाया और दुष्ट पापियों अधर्मियों के संकट से मुक्त कराया। इसी तरह राजस्थान की धरती पर कई लोक देवता हुए हैं जिसमें श्री बाबा रामदेव जी, हड़बू जी, पाबूजी,मेहाजी और वीर तेजाजी महाराज हुए हैं। वीर तेजाजी महाराज राजस्थान सहित मध्यप्रदेश और गुजरात में लोक देवता के रूप में पूजे जाते हैं।

किसान वर्ग अपनी खेती की शुरूआत व खुशहाली के लिये तेजाजी की पूजा-अर्चना है। तेजाजी के वंशज मध्य भारत के खिलचीपुर से आकर मारवाड़ परगना में बस गए थे। वीर तेजाजी ने ग्यारवीं सदी में गायों की रक्षा के लिए डाकुओं से भंयकर युध्द किया था और गौ-माता की रक्षा करने में अपने प्राण दांव पर लगा दिये थे। वे राजस्थान के नागौर जिले के खरनाल गाँव के निवासी थे।

भादवा सुदी दशमी को वीर तेजाजी महाराज का पूजन होता है और विशाल मेला भरा जाता है। इसी दिन लोक देवता बाबा रामदेव जी के मेले का समापन होता है। वीर तेजाजी महाराज को भारत वर्ष के जाट समुदाय में तेजाजी का महत्त्वपूर्ण स्थान हैं इन्हे कुल देवता भी मानते है। लोक देवता वीर तेजाजी का जन्म नागौर में खड़नाल गाँव में ताहरजी और रामकुंवरी के घर माघ शुक्ल, चौदस संवत 1130 यथा 29 जनवरी 1074 को जाट परिवार में हुआ था। तेजाजी के जन्म के बारे में कहा गया है-

” जाट वीर धौलिया वंश गांव खरनाल के मांय।
आज दिन सुभस भंसे बस्ती फूलां छाय।।
शुभ दिन चौदस वार गुरु, शुक्ल माघ पहचान।
सहस्र एक सौ तीस में प्रकटे अवतारी ज्ञान।। “

भारत में वीर तेजाजी के अनेक मंदिर हैं राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात तथा हरियाणा में उनके मंदिर हैं। वीर तेजाजी महाराज लोक देवता के रूप में पूजे जाते हैं। यह महान गौ भक्त के रूप में जाने व पूजे जाते हैं। एक प्रचलित गाथा के अनुसार गौ-माता की रक्षाके लिए ग्यारहवी सदी में गायों की रक्षा करने में अपने प्राण दांव पर लगा दिये थे। वे खड़नाल गाँव के निवासी थे। भादो शुक्ला दशमी को तेजाजी का पूजन होता है। तेजाजी का भारत के जाटों में महत्वपूर्ण स्थान है।

तेजाजी सत्यवादी और दिये हुये वचन पर अटल थे। उन्होंने अपने आत्म – बलिदान तथा सदाचारी जीवन से अमरत्व प्राप्त किया था। उन्होंने अपने धार्मिक विचारों से जनसाधारण को सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया और जनसेवा के कारण निष्ठा अर्जित की। जात – पांत की बुराइयों पर रोक लगाई। शुद्रों को मंदिरों में प्रवेश दिलाया। पुरोहितों के आडंबरों का विरोध किया। तेजाजी के मंदिरों में निम्न वर्गों के लोग पुजारी का काम करते हैं।

समाज सुधार का इतना पुराना कोई और उदाहरण नहीं है। उन्होंने जनसाधारण के हृदय में सनातन धर्म के प्रति लुप्त विश्वास को पुन: जागृत किया। इस प्रकार तेजाजी ने अपने सद्कार्यों एवं प्रवचनों से जन – साधारण में नवचेतना जागृत की, लोगों की जात – पांत में आस्था कम हो गई कर्म, शक्ति, भक्ति व् वैराग्य का एक साथ समायोजन दुनियां में सिर्फ वीर तेजाजी के जीवन में ही देखने को मिलता हैं।तेजाजी का जन्म माघ शुक्ला चतुर्द्र्शी विक्रम संवत् 1130 में हुआ।

एक कथा के अनुसार बताया गया है बाल्यकाल में ही विवाह हो जाने के इन्हें यह भी पता नही था कि मै विवाहित हूं। एक दिन तेजाजी जब खेत में हल चला रहे थे, उस दिन इनकी भाभी देर से खाना लेकर पहुंची। इस पर तेजाजी ने कहा इतनी देर कहां हो गई तब भाभी बोली कि तुम्हारी पत्नी तो पीहर में बैठी मौज कर रही हैं मै यहाँ काम के मारे पिसती जा रही हूं। यह बात सुनकर तेजाजी को यह बहुत बुरा लगा और अपने ससुराल का पता पूछकर बिना भोजन किये ही घोड़ी पर सवार होकर ससुराल की ओर रवाना हो गये।

जब तेजाजी ससुराल पहुचे तो इनकी सास गायों से दूध निकाल रही थी। तेजाजी के घोड़ी (लीलण नाम की) के खुर की आवाज सुनकर दूध देती गाय बिदक गई। इस पर सासू बोली-

‘ कि नाग रो झातियोड़ो ओ कुण हैं ? जणी गायां ने भिड़का दी रे।’

तेजाजी ने जब यह सब गया सुना तो यह बहुत बुरा लगा और बहुत दुखी हुए। वे तत्काल वहां से लौट गये। जब ससुराल वालों को पता चला तो तेजाजी को रोकने की बहुत कोशिश की मगर, पर वे नही माने। पर उनकी धर्मपत्नी ने बड़ी मुश्किल एक रात रुकने के लिए राजी किये। फिर वहां रूके लेकिन आधी रात के करीब लाछा नामक गुजरी रोती-बिलखती आई कि रात को कुछ चोर आए और लाछा गुजरी की गाये घेर ले गये। तेजाजी महाराज ने उनकी आवाज सुनकर बाहर आये बोले मैं तेरी गायें डाकुओं के चुंगल से छुड़ा लाऊंगा। और अपनी लीलण घोड़ी पर सवार होकर डाकुओं के पीछे गए।

इस बिच रास्ते में एक बांबी के पास भाषक नामकसांप घोड़े के सामने आ जाता है एवं तेजा को डँसना चाहता हैं तब तेजा उसे वचन देते हैं कि लाछा गूजरी की गायें छुड़ाने के बाद मैं वापस यहीं आऊंगा,तब मुझे डँस लेना अपने वचन का पालन करने के लिए डाकू से तेजाजी गायों की रक्षा के लिए घोर युध्द किया डाकुओं से गायों मुक्त करवाया गाएं छुड़ाने के बाद लहुलुहान अवस्था में तेजाजी अपने वचन मुताबिक नाग के पास आते हैं तेजा को घायल अवस्था में देखकर नाग कहता है कि तुम्हारा तो पूरा शरीर कटा-पिटाहै मैं दंश कहाँ मारूँ तब वीर तेजा उसे अपनी जीभ पर काटने के लिए कहते हैं।

वीर तेजा की वचनबद्धता को देखकर नाग उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहता है कि- “आज के दिन (भाद्रपद शुक्ल दशमी) से पृथ्वी पर कोई भी प्राणी,जो सर्पदंश से पीडि़त होगा, उसे तुम्हारे नाम की ताँती बाँधने पर जहर का कोई असर नहीं होगा।” उसके बाद नागतेजाजी की जीभ पर दंश मारता है। तभी से भाद्रपद शुक्ल दशमी को तेजाजी के मंदिरों में श्रृद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और सर्पदंश से पीडि़त व्यक्ति वहाँ जाकर तांती खोलते हैं।

समाज सुधार के कार्य :-

बचपन में ही उनके साहसिक कारनामों से लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे. कुंवर तेजपाल बड़े हुए. उनकेचेहरे की आभा चमकने लगी। वे राज-काज से दूर रहते थे । वे गौसेवा में लीन रहते थे उन्होंने कृषकों को कृषि की नई विधियां बताई कि खेती करने का तरीका बताया पहले जो बीज उछाल कर खेत जोता जाता था, उस बीज को जमीन में हल द्वारा ऊर कर बोना सिखाया ।

फसल को कतार में बोना सिखाया इसलिए तेजाजी को कृषि वैज्ञानिक कहा जाता है। गौ सेवा व खेतों में हल जोतने में विशेष रुचि रखते थे। तेजाजी ने ग्यारवीं सदी में गायों की डाकुओं से रक्षा करने में कई बार अपने प्राण दांव पर लगा दिये थे। तेजाजी सत्यवादी और दिये हुये वचन पर अटल रहते थे।

उन्होंने अपने आत्म-बलिदान तथा सदाचारी जीवन से अमरत्व प्राप्त किया था। उन्होंने अपने धार्मिक विचारों से जनसाधारण को सद् मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया और जनसेवा के कारण निष्ठा अर्जित की। उन्होंने जात – पांत की सामाजिक बुराइयों पर रोक लगाई और आपसी भेदभाव की दिवारों को तोड़ा शुद्रों को मंदिरों में प्रवेश दिलाया। पुरोहितों के आडंबरों का विरोध किया।

इसीलिये तेजाजी महाराज के मंदिरों में निम्न वर्गों के लोग पुजारी का काम करते हैं। समाज सुधार का इतना पुराना कोई और उदाहरण नहीं हैं। उन्होंने जनसाधारण के हृदय में हिन्दू धर्म के प्रति लुप्त विश्वास को पुन: जागृत किया।इस प्रकार तेजाजी ने अपने सद्कार्यों एवं प्रवचनों से जन – साधारण में नव चेतना जागृत की । वीर तेजाजी महाराज आज भी सब वर्ग लोगों के आस्था का केंद्र है जो सामाजिक एकता की गहरी मिशाल है। वीर तेजाजी के जन्मोत्सव पर उन्हें सादर नमन् ।

जय वीर तेजाजी महाराज !


निवास – ” श्री हरि विष्णु कृपा भवन “
ग्राम – श्री गर्गवास राजबेरा, पोस्ट ऑफिस -ऊण्डू ,
तहसील उपखंड- शिव, जिला -बाड़मेर, राजस्थान
संपर्क सूत्र व्हाट्सएप – +91-9414-94-2344
ई-मेल – rawatgargundoo@gmail.com

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