प्रेमचंद जिनके रचनाओं के बिना हिंदी साहित्य अधूरा है…

निक्की शर्मा रश्मि, मुंबई

प्रेमचंद जिनके बिना हिंदी साहित्य अधूरा है। पूस की रात, कफन, पंच परमेश्वर,बड़े भाई साहब,बूढ़ी काकी,दूध का दाम और गोदान आपने जरूर पढ़ा होगा। जो साहित्य में रुचि रखते हैं उनकी जुबान पर सबसे पहले इन पुस्तकों का नाम जरूर आता है। हिंदी साहित्य में प्रेमचंद जिनके बिना हिंदी साहित्य अधूरा है, इनकी लिखी यह रचना सभी के मन को मोह लेती है। एक अमिट छाप हमेशा के लिए छोड़ जाती है।

उनकी पहली रचना एक व्यंग्य थी फिर धीरे-धीरे उन्होंने कई कहानियां भी लिखी। कहानी, उपन्यास धीरे धीरे एक महान लेखकों में उनका नाम शुमार हो गया। उनका वास्तविक नाम धनपत राय था ,बाद में उनकी लेखनी ने उन्हें कई नाम दिए नवाब राय और मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी उन्हें जाना जाने लगा। प्रेमचंद की शिक्षा उर्दू से शुरू हुई थी उनकी शादी कम उम्र में हो गई और पत्नी से नहीं बनने के कारण बाद में उन्होंने दूसरा विवाह बाल विधवा शिवरानी देवी से किया।

प्रेमचंद ने लेखन की शुरुआत उर्दू में प्रकाशित होने वाले जमाना पत्रिका से की फिर सरस्वती पत्रिका में उनकी रचना सौत आई।उपन्यास सेवा सदन, गोदान, कर्मभूमि और रंगभूमि की लोकप्रियता के कारण उन्हें उपन्यास सम्राट कहा जाने लगा। प्रेमचंद की साहित्य के प्रति लगाव के वजह से दो पत्रिकाओं में उन्होंने संपादन का काम भी किया बाद में मासिक पत्र हंस की भी शुरुआत की और सप्ताहिक अखबार की भी उन्होंने शुरुआत की। उनकी रचनाओं में वास्तविकता झलकती थी।

वो भावना, परिस्थिति और समस्याओं का चित्रण बखूबी किया करते थे। उनकी रचनाओं को देश ही नहीं विदेश में भी लोकप्रियता मिली। लेकिन पारिवारिक स्थिति उनकी अच्छी नहीं रही थी।गरीब परिवार में जन्मे प्रेमचंद काफी मुसीबतों से लड़कर आगे बढ़े। मां का साया केवल 8 साल की उम्र में ही उनके सर से उठ गया था और 14 साल की उम्र में पिता ने भी साथ छोड़ दिया। उनके देहांत के बाद 15 साल में विवाह लेकिन उसमेें भी उन्हें मुसीबतों का सामना करना पड़ा।

पत्नी से नहीं बनने के कारण समस्या बढ़ती ही गई और वह अलग हो गए। इन परिस्थितियों से लड़कर वो आगे बढ़ते रहे बाद में दूसरी शादी की। 1901 में उन्होंने उपन्यास लिखना शुरू किया बाद में कहानी की भी शुरुआत की। प्रेमचंद ने पूरा जीवन बनारस और लखनऊ में बिताया ।पत्र-पत्रिकाओं में अपना योगदान देते रहें संपादक का काम करते रहे। हिंदी कहानी को जीवन देने का योगदान मुंशी प्रेमचंद को ही जाता है। नमक का दरोगा, पूस की रात इन कहानियों के कारण ही तो उन्हें कलम का सिपाही, कथा सम्राट कहा जाता है। हिंदी साहित्य को नई पहचान नया जीवन देने वाले मुंशी प्रेमचंद का नाम हमेशा अमर रहेगा।

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