क्षेत्रीय भारतीय भाषा ओ मे गुजराती सिनेमा का इतिहास

डॉ गुलाब चंद पटेल
कवि लेखक अनुवादक

गुजराती सिनेमा सामन्यतः ढोली वुड या गोली वुड के नाम से जाना जाता है, भारतीय सिनेमा उद्योग का प्रादेशिक और स्थानिक भाषा के बड़े सिनेमा उद्योगों मे से एक ऎसा गुजराती भाषा के साथ जुड़ा हुआ उद्योग हे, गुजराती में प्रारम्भ से अभी तक करीबन 1000 से अधिक फ़िल्में निर्मित हुई है,, मुंगी फिल्म के ज़माने में, सिने जगत में व्यक्तिगत रीत से बहुत सारे गुजराती थे.

गुजराती सिनेमा का छोर भूत काल में 1932 तक लंबा इतिहास है, जब 9 अप्रैल 1932 के दिन प्रथम फिल्म (बोल पट) नरसिंह मेहता पेश हुआ, 1960, 70,80 के दशक में फूले फैले लेकिन बाद में इस उद्योग की स्थिति खराब हुई, 2002 मे तो नए बने हुए फ़िल्मों की आंक 20 से भी ज्यादा कम हो गया था, उसके बाद, ग्राम्य इलाक़ों मे मांग और नई नई तकनीक से फ़िल्मों में शहरी विषयो का समावेश के कारण 2010 मे फिर ये उद्योग में तेजी आई, फिर 2005 मे तो सरकार ने गुजराती फ़िल्मों को 100 प्रतिशत कर मुक्त की, और 2016 मे प्रोत्साहन की योजना नीति के रूप में अमली की गई,

स्वतन्त्रता के बाद (1947-1970)

1947 को भारत को स्वतन्त्रता मिलने के बाद गुजराती फ़िल्मों के निर्माण में यकायक तेजी आई, सिर्फ 1948 मे 26 फ़िल्मों का निर्माण किया गया, 1946 से 1952 के बीच फ़िल्मों का निर्माण किया गया जिस में 27 चल चित्र संत, सती या फिर डाकू ओ के विषय पर आधारित थी, ये कथायें उनसे परिचित ऎसे ग्राम्या इलाके के प्रेक्षकों के लिए थी, खास कर के अनेक लोगों को जानकारी हो एसी पौराणिक और लोक संस्कृति पर आधारित थी.

विष्णु कुमार एम व्यास द्बारा निर्देशित फ़िल्में राणा क देवी (1946)ये राणा क देवी की लोक कथा पर आधारित था, ये फ़िल्मों के द्वारा निरूपम रॉय ने उनकी अभिनेत्री के रूप में यात्रा की शुरुआत की और बाद में उन्होंने हिंदी फ़िल्मों में अनेक विध पात्र निभाए है, निरूपमा रॉय ने नानू भाई भट्ट की निगरानी में हिंदी फिल्म गुजराती की प्रथम आवृति एसी मीराबाई (1946)मे भी अभिनय किया.

उसके इलावा उन्होंने पूना तर निर्देशित गुण सुन्दरी (1948)मे भी अभिनय किया गया था, चतुर्भुज दोषी निर्देशित फिल्म “करी या वर “(1948)द्वारा दीना पाठक को फिल्म जगत में प्रवेश मिला, चतुर्भुज दोषी द्वारा जवे र चंद मे घानी की उपन्यास वैवि शाल पर आधारित फिल्म वैवि शाल (1950)का भी एडिटिंग किया, 1941 को रणजीत स्टूडियो द्वारा निर्मित हिंदी फिल्म शादी, पूना तारे मंगल फेरा, (1949)नाम से दुबारा फिल्म बनाया गया.

इस के अलावा और फ़िल्मों में रामचंद्र ठाकुर द्वारा एडिट की गई वरिष्ठों के कारण, मतलब व दिलों के बांके (1948)रति भाई पूना तार द्वारा निर्देशन की गई “गाड़ा का बेल” (1950)जो प्रभु दास द्विवेदी के नाटक पर आधारित थी और वल्लभ चौकसी द्वारा संपादित की गई “लि लु डी धरती ” (1968)जो चुनी लाल मड़ियां के उपन्यास पर आधारित थी, आधुनिक करन के कारण निर्मित फ़िल्मों में तकलीफ देखने को मिलता है, गाड़ा के बेल जेसी फ़िल्मों में परिवर्तन और सत्य का निरूपण असरकारक रूप में देखने को मिलता है.

1951 से 19 70 के समय में फ़िल्मों के निर्माण में कटौती आई, यह समय काल में सिर्फ 55 फ़िल्मों का ही निर्माण हुआ था, पन्नालाल पटेल की उपन्यास पर आधारित “मिले हुए जीव” (1956)का निर्देशन मनोहर रस कपूर के द्वारा किया गया, और उस उपन्यास के लेखक पन्नालाल पटेल खुद ही थे, रस कपूर और निर्माता अभिनेता चा पासी भाई नागदा ने अनेक फ़िल्मों का निर्माण किया.

जिस में जोगी दास खु मान (1948)कह या घरों कं थ (1950)कन्या दान, (1951)मु लू माने क (1955)मिले हुए जीव, (1956)का दू मक रानी (1960)मेंहदी रंग लगा, (1960)जोगी दास खुमार (1962)अखंड सौभाग्य वटी (1963)और कला पी (1966)शामिल हे, अखंड सौभाग्य वटी जिस में बोली वुड की अभिनेत्री आशा पारेख ने अभिनय किया गया था, वो 1963 की सफल फिल्म थी.

वो फिल्म फाइनैंस कॉर्पोरे सन द्वारा बजट पाकर निर्माण होने वाली यह प्रथम गुजराती फिल्म थी, कांति लाल राठौड़ द्वारा संपादित फिल्म कन कु (1969)वो (1970) मे विस्तृत हुई थी, यह फिल्म को 17th राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार गुजराती श्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार प्राप्त हुआ था, उसकी अभिनेत्री पल्लवी मेहता को शिकागो अन्तरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में इनायत किया गया था, हिंदी फिल्म जगत के लोकप्रिय कलाकार संजीव कुमार द्वारा भी बहुत सारी गुजराती फ़िल्में बनाई गई थी,

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